Bawal Film Review || बवाल फिल्म समीक्षा
कहानी
फिल्म की कहानी लखनऊ में रहने वाले अज्जू भैया उर्फ अजय दीक्षित (वरुण धवन) की है। हीरो जैसी कद-काठ और स्टाइल रखने वाला अज्जू यों तो एक साधारण-सा इतिहास का टीचर है, मगर पूरे शहर में उसके खूबियों का गुणगान होता रहता है। बकौल लखनऊ की पब्लिक अज्जू भैया इतने होनहार हैं कि नासा में साइंटिस्ट, आर्मी में अफसर, जिले में कलेक्टर, खेल में क्रिकेटर बनते -बनते इसलिए रह गए, क्योंकि उन्हें टीचर बन कर बच्चों का भविष्य जो बनाना था। शहर के बच्चे से लेकर बूढ़े तक हर कोई उसे किसी सुपरमैन से कम नहीं मानता, मगर उसके परिवार और दोस्त को छोड़कर ये कोई नहीं जानता कि अज्जू की पूरी इमेज एक छलावा है। उसने लोगों के सामने अपनी जो इमेज बनाई है, उसमें कुछ भी सच नहीं। यहां तक कि वो इतिहास का शिक्षक भी जुगाड़ लगा कर बना है।
कहानी के आगे बढ़ने के साथ पता चलता है कि पढ़ी -लिखी सुलझी हुई टॉपर निशा (जाह्नवी कपूर) के साथ उसकी शादी बहुत बुरे दौर से गुजर रही है। असल में निशा को बचपन से मिर्गी जैसी बीमारी की शिकायत रही है। उसकी बीमारी के बारे में जानते हुए भी अज्जू महज अपनी इमेज सेट करने के लिए निशा के साथ ब्याह रचाता है, मगर जब शादी वाले दिन निशा को मिर्गी का दौरा पड़ता है, तो अज्जू इस बात से डर जाता है कि अगर कभी सार्वजनिक तौर पर निशा को ये दौरा पड़ेगा तो उसकी पब्लिक इमेज चूर-चूर हो जाएगी। इस वजह से वह निशा को पूरी तरह से उपेक्षित कर देता है, मगर कहानी में ट्विस्ट तब आता है, जब विधायक के बेटे को थप्पड़ मारने के एवज में उसे स्कूल से एक महीने के लिए सस्पेंड कर दिया जाता है। इस विकट स्थिति में भी अज्जू अपनी बिगड़ती इमेज को सुधारने का जुगाड़ लगा लेता है। वह अपने माता-पिता से पैसे लेकर यूरोप के सफर पर जाने का प्लान बनाता है। वह स्कूल वालों को कहता है कि यूरोप जाकर वह स्टूडेंट्स को दूसरे विश्वयुद्ध के बारे में जगहों और घटनाओं की लाइव जानकारी बिना शुल्क देगा।
इस सफर में उसे मजबूरन निशा को भी साथ ले जाना पड़ता है। यूरोप जाकर उसे अहसास होता है कि दूसरे विश्व युद्ध की तरह उसके अंदर भी एक युद्ध छिड़ा है। इस ट्रिप से क्या अज्जू अपनी नौकरी को बचा पाता है? पत्नी निशा से बिगड़े हुए रिश्ते किस करवट लेते हैं? क्या वह अपनी झूठी इमेज के आवरण से निकल पाता है? ये आपको फिल्म देखने के बाद ही पता चलेगा।
'बवाल' का ट्रेलर
स्टार की परफॉरमेंस
डायरेक्शन
निर्देशन की बात करें, तो फिल्म का फर्स्ट हाफ मजेदार और हल्की-फुल्की कॉमिडी के साथ बुना गया है। हालांकि निर्देशक ने कहानी और किरदारों को स्थापित करने में थोड़ा ज्यादा समय खर्च कर दिया है, इसलिए फिल्म थोड़ी स्लो लगाती है। इंटरवल पॉइंट के बाद कहानी अपने असली मकसद पर आती है। यहां से नितेश फिल्म को एक अलग ट्रीटमेंट देते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि द्वितीय विश्व युद्ध के बैकड्रॉप पर लव स्टोरी का को बुनना एक टास्क ही था, मगर नितेश इसे अश्विनी अय्यर तिवारी की कहानी और पियूष गुप्ता, निखिल मेहरोत्रा और श्रेयश जैन जैसे लेखकों की टीम के साथ बखूबी निबाह ले जाते हैं। फिल्म के संवाद, 'हम सब भी तो थोड़े बहुत हिटलर जैसे ही हैं न, जो अपने पास है, उससे खुश नहीं हैं, जो दूसरे के पास है, वो चाहिए।' वर्ल्ड वॉर तो खत्म हो गई, मगर ये अंदर की वॉर कब खत्म होगी?'
तकनीकी पक्ष
कहाँ रह गयी कमी
डेनियल बी जॉर्ज का बैकग्राउंड म्यूजिक वर्ल्ड वॉर के दर्शयों में पूरक साबित होता है, मगर मिथुन, तनिष्क बागची और आकाशदीप सेनगुप्ता की तिकड़ी संगीत के मामले में कोई कमाल नही दिखा पाई है।
देखे या नहीं
मेसेज वाली प्रेम कहानी के शौक़ीन यह फिल्म देख सकते हैं।
और अंत में रेटिंग
बवाल को 3 स्टार।
ऐक्टर:वरुण धव,जान्हवी कपूर,मनोज पाहवा,अंजुमन सक्सेना,मुकेश तिवारी,गुंजन जोशी
डायरेक्टर : नितेश तिवारी
श्रेणी:Hindi, रोमांस, ड्रामा
अवधि:2 Hrs 2 Min

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