धर्म क्या है | Dharm Kya Hai | Motivational Story | Heart Touching Story | दिल को छूने वाली कहानी | प्रेरणादायक कहानी | मोटिवेशनल स्टोरी
आदि शंकराचार्य ने जब सौर, जैन,शैव, शाक्त,पशुपूजक,यक्ष, नाग आदि परम्परा से जुड़े लोगों को हिंदू धर्म के नीचे इकट्ठा किया तो पूरी दुनिया उनके कदमों में थी। ऐसा कोई नहीं था जो उनके विरोध में हो।पर आदि शंकर जब अपनी माता को किया वादा पूरा करने के लिए अपने घर लौटे और उनके अंतिम संस्कार के लिए नदी किनारे के जाने लगे तो उन्हीं के जाति बिरादरी के लोग भयानक विरोध में उतर आए। उनका कहना था कि तुम चाहे जितने बड़े सन्यासी हो पर किताबों में लिखा है की सन्यासी अपने माँ का अंतिम संस्कार नहीं कर सकता तो हम तुम्हें यह अधिकार नहीं दे सकते।
अंत में आदि शंकर अपने माँ के शव को लेकर घर वापिस आ गये, घर के सामने ही अंतिम संस्कार किया। पूरे केरल में यह बात फैल गई। समाज ने उन रूढ़ीवादी किताबवादियों के विरोध में नयी परम्परा बना दी। तब से लेकर आज तक केरल में उस घटना की याद में और रूढ़िवाद के विरोध में हिंदू परिवार किसी भी मृतक का अंतिम संस्कार गाँव घर में ही करते हैं। उन किताबवादियों का नाम कहने सुनने वाला कोई एक भी नहीं बचा। उनकी मूर्खतापूर्ण ज़िद जो आदि शंकर के सहज मानव धर्म और संवेदनशीलता को चुनौती दे रही थी,वह समूल नष्ट हो गयी। तभी आदि शंकर विवेक चूड़ामणि में लिखते हैं की जिसको धर्म का ज्ञान हो गया उसके लिए किताब बेकार है।
कुत्ता पालना है की नहीं पालना है,इसके लिए किताब खोला जा रहा है,लहसुन ख़ाना है की नहीं इसके लिए किताब खोला जा रहा है, मुखौटा पहनना है या नहीं इसके लिए किताब ख़िलाफ़ जा रहा है। किताब भी लिखने वाले कैसे कैसे??
एक से एक ब्राह्मण हुए जिन्होंने न्याय-वैशेषिक, सांख्य-योग,मीमांसा-वेदांत, कठोपनिषद आदि की रचना की तो दूसरे तरफ़ ऐसे हुए की खीर पर बिक गए और लिख आए की ब्राह्मण को खीर खिलाने से पुण्य मिलता है। किसी ने आयुर्वेद और सर्जरी की किताब लिखी तो किसी ने अकबर को पैसे के लालच में बालमुकुंद ब्राह्मण बता दिया, कुछ ने अल्लोपनिषद लिखा दिया।
धर्म का मर्म किताब में लिखने से किताब की महिमा है,किताब में कुछ लिखने से धर्म की महिमा नहीं है,यह छोटी सी बात लोगों को समझ नहीं आती।
धर्म दूसरे के साथ किए जाने वाले उन व्यवहारों का समुच्चय है जो हम स्वयं के साथ चाहते हैं। धर्म है बिना किसी को दुःख दिये स्वयं को खुश रखना। धर्म है दूसरे के सुख में स्वयं का सुख पाना।धर्म है स्वयं में अनुशासन उत्पन्न करके दूसरों को प्रेरित करना। धर्म आत्मा के भीतर स्थित है। वह किसी किताब और भाषा का गुलाम नहीं है।जैसे आत्मा अजर अमर सनातन और निर्लेप है,वैसे ही धर्म भी अजर अमर सनातन और निर्लेप है।जंगल के बीहड़ में बैठा व्यक्ति जिसने जीवन कभी कोई किताब न देखा हो, कोई सत्संग न किया हो, कर्मकांड न किया हो वह भी महान धार्मिक हो सकता है और रोज़ाना मंदिर में विग्रह के सामने बैठने वाला भी भयानक अधार्मिक हो सकता है।धर्म को किताब से ज़्यादा अपने आत्मा में खोजिए,वह वहीं छुपकर बैठा है। बिलकुल निर्मल और निर्लेप,बस अहंकार रहित चित्त रूपी दीपक ही तो जलाना है।
हम बदलेंगे,युग बदलेगा।

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