Shani Pradosh Vrat Katha : शनि प्रदोष व्रत के दिन पूजा के बाद जरूर पढ़ें ये कथा, प्राप्त होगा भोले बाबा का आशीर्वाद
Pradosh Vrat Katha: सनातन धर्म में कोई भी व्रत करते समय इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि पूजा के बाद व्रत कथा अवश्य पढ़ी या सुनी जाए. क्योंकि बिना कथा व्रत पूरा नहीं माना जाता.
Pradosh Vrat Katha: पंचांग के अनुसार प्रत्येक माह की त्रयोदशी तिथि प्रदोष व्रत रखा जाता है और सावन माह का प्रदोष 15 जुलाई 2023, शनिवार के दिन है. इस व्रत का हिंदू धर्म में विशेष महत्व माना गया है. क्योंकि सावन का महीना भगवान शिव को समर्पित है और प्रदोष व्रत के दिन भी भोलेनाथ का पूजन किया जाता है. इस बार सावन का प्रदोष व्रत शनिवार के दिन पड़ रहा है और इसलिए इसे शनि प्रदोष व्रत नाम दिया गया है. इसी प्रकार यदि प्रदोष व्रत सोमवार के दिन पड़े तो उसे सोम प्रदोष व्रत, मंगलवार के दिन मंगल प्रदोष व्रत, बुधवार को बुध प्रदोष व्रत, गुरुवार को गुरु प्रदोष व्रत और शुक्रवार को पड़े तो इसे शु्क्र प्रदोष व्रत कहा जाता है. सुहागिन महिलाओं के लिए प्रदोष व्रत का खास महत्व माना गया है और इस दिन महिलाएं अखंड सौभाग्य की कामना से व्रत रखती हैं. यह भी कहा जाता है प्रदोष व्रत रखने से निसंतान दंपति की संतान प्राप्ति की कामना भी पूरी होती है. अगर आप भी शनि प्रदोष व्रत रख रहे हैं तो पूजा के बाद यह व्रत कथा अवश्य पढ़ें.
शनि प्रदोष व्रत कथा
प्राचीन समय में एक ब्राम्हणी रहती थी, जो पति की मृत्यु के बाद अपना पालन-पोषण भिक्षा मांगकर करती थी. एक दिन जब वह भिक्षा मांग कर लौट रही थी, तो उसे रास्ते में दो बालक दिखे, जिन्हें वह अपने घर ले आई. जब वे दोनों बालक बड़े हो गए तो ब्राह्मणी दोनों बालक को लेकर ऋषि शांडिल्य के आश्रम चली गई. जहां ऋषि शांडिल्य ने अपने तपोबल से बालकों के बारे में पता कर कहा-हे देवी! ये दोनों बालक विदर्भ राज के राजकुमार हैं. गंदर्भ नरेश के आक्रमण से इनके पिता का राज-पाठ छीन गया है.
ब्राह्मणी और राजकुमारों ने विधि-विधान से प्रदोष व्रत किया. फिर एक दिन बड़े राजकुमार की मुलाकात अंशुमती से हुई, दोनों एक-दूसरे को चाहने लगे. तब अंशुमती के पिता ने राजकुमार की सहमति से दोनों की शादी कर दी. फिर दोनों राजकुमार ने गंदर्भ पर हमला किया और उनकी जीत हुई. बता दें कि इस युद्ध में अंशुमती के पिता ने राजकुमारों की मदद की थी. दोनों राजकुमारों को अपना सिंहासन वापस मिल गया और गरीब ब्राम्हणी को भी एक खास स्थान दिया गया, जिससे उनके सारे दुख खत्म हो गए. राज-पाठ वापस मिलने का कारण प्रदोष व्रत था, जिससे उन्हें संपत्ति मिली और जीवन में खुशहाली आई.

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