भिक्षा का प्रताप | Viksha Ka Pratap | दिल को छूने वाली कहानी | प्रेरणादायक कहानी | मोटिवेशनल स्टोरी | Heart Touching Story | Motivational Story
अंत में महाराष्ट्र के प्रसिद्ध संत और छत्रपती शिवाजी महाराज के गुरू समर्थ रामदास जी के जीवन का एक प्रसंग -
एक बार समर्थ गुरू रामदास जी एक घर के द्वार पर खड़े होकर 'जय-जय श्री रघुवीर समर्थ' का उद्घोष किया। गृहिणी का अपने पति से कुछ देर पूर्व कुछ कहा-सुनी हुई थी, जिससे वह गुस्से में थी। बाहर आकर चिल्लाकर बोली - 'तुम लोगों को भीख मांगने के सिवा और कुछ दूसरा काम नहीं है? मुफ्त मिल जाता है, अतः चले आते हो। जाओ, कोई दूसरा घर ढूँढो, मेरे पास अभी कुछ नहीं है।'
श्री समर्थ हँकर बोले - 'माताजी! मैं खाली हाथ किसी द्वार से वापस नहीं जाता। कुछ न कुछ तो लूँगा ही।'
वह गृहिणी उस समय चूल्हा लीप रही थी। गुस्से में आकर उसने उसी लीपनेवाले कपड़े को उनकी तरफ फेंक दिया।
श्री समर्थ प्रसन्न हो वहाँ से निकले। उन्होंने उस कपड़े को पानी से साफ किया और बत्तियाँ बनायी और उसी से प्रभु श्रीराम की आरती करने लगे। इधर ज्यों-ज्यों उन बत्तियों से आरती होती त्यों-त्यों उसका दिल पसीजने लगा। उसे उनके अपमान करने का इतना रंज हुआ कि वह विक्षिप्त हो उनको खोजने के लिए दौड़ पड़ी। अंत में वे उसे उस देवालय में मिले जिसमें वे उन बत्तियों से आरती करते थे। वहाँ पहुंचकर उसने श्री समर्थ से क्षमा माँगी और बोली - 'महात्मन, व्यर्थ ही मैंने आप सरीखे महापुरुष का निरादर किया। मुझे क्षमा करें।'
श्री समर्थ बोले - माता! तुमने उचित ही भिक्षा दी थी। तुम्हारी भिक्षा के प्रताप से ही यह देवालय प्रज्जवलित हो उठा है। तुम्हारा दिया हुआ भोजन जल्द ही खत्म हो जाता।

0 टिप्पणियाँ