अशोक महान की गुरु भक्ति | Ashok Mahan Ki Guru Bhakti | दिल को छूने वाली कहानी | प्रेरणादायक कहानी | मोटिवेशनल स्टोरी | Heart Touching Story | Motivational Story
विश्व विजेता अशोक महान अपने गुरु चाणक्य का बहुत आदर करता था. उनकी द्वारा दी गई शिक्षाओं पर हमेशा अमल करता. अशोक के लिए चाणक्य के शब्द, शब्द नहीं मानों बल्कि पत्थर के लकीर हुआ करते थे. वे कभी भी अपने गुरु के बातों को नहीं टालते, सदैव उनकी आज्ञा का पालन किया करते.
एक दिन गुरु-शिष्य दोनों पैदल भ्रमण कर रहे थे. प्राकृति का आनंद लेते हुए, भ्रमण करते-करते वे एक गहरे नाले के पास पहुंचे. चाणक्य के दिल में भी अपने शिष्य के लिए अथाह प्रेम था. वे अशोक से बोले – अशोक,,, नाले को पहले मै पार करूँगा उसके बाद तुम पार करना. मै देख लूँ कि आखिर नाले की गहराई कितनी है.
परन्तु अशोक के दिल में कुछ और ही था, उसने प्रथम बार गुरु के आज्ञा का उलंघ्घन करते हुए, गुरु से पहले ही नाला पार कर लिया. अशोक के इस हरकत पर चाणक्य ने नाराज होकर पूछा – अशोक,, तुमने आज तक मेरी आज्ञा को सिर आंखों पर लिया, सदैव मेरी बात मानी, परन्तु आज ऐसा क्यों किया.
अशोक ने विनयपूर्वक वाणी से कहा – गुरुदेव,, अगर नाला पार करते समय आपको कुछ हो जाता तो मै ऐसा गुरु दोबारा कहाँ पाता. परन्तु यदि मै नाले में डूब जाता तो आप अपने ज्ञान से हजारो अशोक खड़ा कर देते.
यह थी अशोक महान कि अपने गुरु के प्रति महान गुरुभक्ति.

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