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नर्क क्या है? जानिए गौतम बुद्ध के जीवन की कहानी से | दिल को छूने वाली कहानी | प्रेरणादायक कहानी | मोटिवेशनल कहानी

 नर्क क्या है? जानिए गौतम बुद्ध के जीवन की कहानी से | दिल को छूने वाली कहानी | प्रेरणादायक कहानी | मोटिवेशनल कहानी

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 आर्टिकल को अंत तक पढ़ते हैं, तो आपको जानने को मिल जायेगा की “नर्क कही बाहर नहीं है, बल्कि वह हमारे भीतर ही है..!” तो चलिए कहानी को शुरू करते हैं।


जानिए नर्क क्या है? गौतम बुद्ध के जीवन की कहानी से | 

दोस्तो यह जीवन इतना बड़ा नही है, जितना बड़ा आप इसे सोचते हैं। पर क्योंकि आपको लगता है की “आपका जीवन बहुत लंबा है इसीलिए आप अपनी ऊर्जा को बेवजह की चीजों पर बर्बाद कर देते हैं” जैसे ईर्षा, घृणा और लालच ..!


दोस्तो क्या आप सोच सकते हैं की “कोई व्यक्ति अपने पूरे जीवन को किसी से ईर्षा करने में बीता दे!!!” आज में आपके साथ एक ऐसे व्यक्ति के जीवन की कहानी शेयर करने वाला हु “जो अपने पूरे जीवन को गौतम बुद्ध से ईर्षा कराने में बिता देता है”


वह व्यक्ति बुद्ध का भिक्षु भी बना और रिश्ते में वह बुद्ध का चचेरा भाई भी था, और उसने बुद्ध के साथ ज्यादा समय भी बिताया था, लेकिन फिर भी उसका जीवन रूपांतरित नही हुआ। जानते हो क्यों?? क्योंकि उसने अपने भीतर कड़वाहट के बीज बोकर रखे हुए थे और उस व्यक्ति का नाम देवदत्त था।


 देवदत्त ने बुद्ध को मारने की बहुत बार कोशिश करी, लेकिन वह हर बार असफल रहा। एक बार देवदत यह सोचता है की वह राजा अजात शत्रु की सेना को लेकर बुद्ध को और उनके सभी भिक्षुओं को समाप्त कर देगा। देवदत्त राजा के पास जाता है और उनसे कहता है की 


“राजन आप मुझे अपनी सेना दीजिए और में आपकी सेना के मदद से उस बुद्ध और उसके संघ को समाप्त कर दूंगा।” लेकिन इस बार भी देवदत्त असफल हो जाता है क्योंकि अब तक राजा अजात शत्रु भी गौतम बुद्ध का अनुयाई बन चुका था।


राजा देवदत्त से कहता है की “बुद्ध को मारना तो दूर की बात है, अगर उनको छोटी सी खरोच भी आई तो मुझसे बुरा कोई नही होंगा, में चाहु तो अभी तुम्हे मृत्यु दंड दे सकता हूं, लेकिन जाओ में तुम्हे छोड़ता हूं, क्योंकि अब में बुद्ध का अनुयाई हूं। इसीलिए बे वजह की हिंसा मुझे शोभा नही देती है।”


“बुद्ध को अगर किसी ने एक बार खुले दिल से सुन लिया तो वह कभी भी बुद्ध से ईर्षा नही कर सकता।”


उस समय तो देवदत्त वहा से चला जाता है लेकिन वह तय करता है की वह अकेला ही बुद्ध की हत्या करेगा। उसके कुछ दिन बाद बुद्ध अकेले ही भिक्षाटन के लिए एक पहाड़ी के रास्ते से जा रहे थे। देवदत्त उस मार्ग में पहले से ही छिपा हुआ बैठा था। उसका उद्देश्य था की मौका मिलते ही वो बुद्ध पर हमला कर देगा।


जब बुद्ध देवदत्त के निकट जाते हैं , तो देवदत्त एक वृक्ष के पीछे छिप जाता है। क्योंकि इतनी हिम्मत बुद्ध के शत्रुओ में भी नही थी की वे बुद्ध पर सामने से वार करें। इसीलिए देवदत भी पीछे से वार करता है। वो बुद्ध के ऊपर पीछे से खंजर फैककर मारता है, लेकिन उसका निशाना चूंक जाता है।


इतने में ही देवदत को सामने से कुछ लोग बुद्ध की तरफ आते हुए दिखते हैं , जिसके कारण वो पेड़ के पिछे ही छिपा हुआ रहता है। वे लोग बुद्ध के पास आकर बुद्ध को प्रमाण करते हैं और बुद्ध के साथ ही गांव की तरफ जाने लगते हैं। बुद्ध के जाने के बाद देवदत यह सोचता है की शायद बुद्ध की मृत्य खंजर से नही लिखी हुई है।


इसीलिए देवदत्त बुद्ध को मारने के लिए कोई और योजना बनाने लगता है। उसके बाद देवदत एक छोटी सी पहाड़ी पर चढ़कर बैठ जाता है। उस पहाड़ी पर छोटे छोटे बहुत सारे गोल पत्थर थे, जिन्हे आसानी से नीचे धकेला जा सकता था। उन पत्थरों का आकार कुछ ऐसा था की अगर किसी के सर पर गिर जाए तो उसकी मृत्यु निश्चित थी।


उस पहाड़ी के नीचे से आने जाने का रास्ता था और देवदत्त यह जानता था की बुद्ध भिक्षाटन के बाद उसी रास्ते से वापस लौट आएंगे। इसीलिए देवदत्त वही पर छिपकर बुद्ध के आने की प्रतीक्षा करने लगता है। कुछ समय प्रतीक्षा करने के बाद देवदत्त यह देखता है की बुद्ध उस पहाड़ी के नीचे से जा रहे हैं। 


बुद्ध को देखते ही देवदत्त पहाड़ी से नीचे पत्थर फैकने के लिए तैयार हो जाता है। जैसे ही बुद्ध उस पहाड़ी के नीचे से जाने लगते हैं, देवदत ऊपर से पत्थर धकेलना शुरू कर देता है। उन पत्थरों से बुद्ध को तो कोई नुकसान नहीं पहुचंता हैं, लेकिन पत्थर धकेलने के कारण उसका पैर पिसल जाता है और पहाड़ी से लुड़कते हुए नीचे गिर पड़ता है।


उस पहाड़ी से नीचे गिरने के कारण वो बुरी तरह से जख्मी हो जाता है। बुद्ध यह जानते हुए भी की देवदत्त उनके प्राण लेना चाहता था फिर भी वे उसे जख्मी हालत में अपने भिक्षुओं के पास ले जाते हैं और उसका उपचार करना शुरू कर देते हैं। और यह देवदत्त का अंतिम समय था।


यानी की देवदत्त ने अपना पूरा जीवन बुद्ध से ईर्षा कराने में बीता दिया हुआ था। देवदत अब होश में था और अपनी अंतिम सांसे गिन रहा था। उसकी आंखों के सामने से उसका पूरा जीवन गुजर रहा था। लेकिन इस बार उसकी आंखों में पश्चाताप के आंसू थे और उसे अपनी गलती का अहसास हो रहा था।


उसे अब यह बात समझ में आ रही थी की “जिसके वह प्राण लेना चाहता था वही उसके प्राण बचाने के प्रयास में लगा हुआ है” देवदत के आंखो से अब बहुत आंसू निकल रहे थे, और वो अब बुद्ध की तरफ देख रहा था। बुद्ध उसके शरीर पर लेप लगा रहे थे।


देवदत्त रोते हुए और लड़खड़ाती हुई आवाज में बुद्ध से कहता है की “में आपसे क्षमा मांगने के भी लायक नहीं हू और मैने आपको बहुत क्षति पहुंचाई हुई है” पर बुद्ध कहते हैं की “मुझे तो कुछ याद ही नहीं” बुद्ध के ये शब्द सुनते ही देवदत्त के आंखो से आंसुओ कि धारा बहने लगती है और वो दौहराता है 


“बुद्धम शरणम् गच्छामि , धमम् शरणम् गच्छामि , संगम शरणम् गच्छामि”


दोस्तो बुद्ध कहते हैं की बुद्ध , संघ और धर्म हर मनुष्य के अंतर में है और स्वयम को जगाने की क्षमता बुद्ध है , जागने के बाद हम जिस पथ पर चलते हैं वह हमारा धर्म है और स्वय के मन को एकांतरित करना यानी उसे केंद्रित करना संघ है। ये तीनो रत्न सभी लोगो के अंतर में है। उसके कुछ क्षण में बाद देवदत्त अपना शरीर त्याग देता है।


 में आप से पूछना चाहता हूं की देवदत्त ने जैसा जीवन जिया? क्या वह जीने लायक था? क्या नर्क किसी और जगह का नाम है?  वह अपना पूरा जीवन ईर्षा की आग में जला और अंत में उसे अपने गलती का अहसास हुआ।


इस बात को सोचना जरूर की 


क्या गलती का अहसास करने के लिए मृत्यु आवश्यक है? और क्या मृत्य आने पर ही हमे यह अहसास होंगा की ‘इर्षा, घृणा और लालच’ ये सभी चीजे व्यर्थ है! क्या उससे पहले हम इस जीवन को सुंदर नही बना सकते? और इसे जीने योग्य नही बना सकते?

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