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शातिर चोर | दिल को छूने वाली कहानी | प्रेरणादायक कहानी | मोटिवेशनल कहानी

 शातिर चोर दिल को छूने वाली कहानी | प्रेरणादायक कहानी | मोटिवेशनल कहानी

RKT News


दोस्तो हमारी मानसिकता कुछ ऐसी है की इस संसार में जितने भी लोग है, उन्हे हम दो हिस्सो मे बांटते हैं। पहिला अच्छे लोग और दूसरा बुरे लोग। पर हम कभी भी यह प्रश्न अपने आप से नही पूछते की कोई व्यक्ति अच्छा या बुरा क्यों बन जाता है? क्योंकि आवश्यक सवाल यह नही है की हम अच्छे कैसे बनें?


बल्कि आवश्यक सवाल यह है की हम इतने बुरे क्यों बन गए हैं और हम बुरे काम क्यों करते हैं? दोस्तो अगर आप भी इन दोनों प्रश्नों के उत्तर आसान भाषा में जानना चाहते हैं? तो यह कहानी आपकी लिए ही है। दोस्तो इस कहानी को अंत तक जरूर पढ़िए। तो चलिए कहानी को शुरू करते हैं।


एक नगर में एक बहुत बड़ा शातिर चोर रहा करता था, और उस चोर के बारे में जानते तो सब थे, पर आज तक उसे कोई पकड़ नही पाया था। उस चोर ने अपना पूरा जीवन चोरी करने में लगा दिया हुआ था। उसके पूरे नगर में और उसके आस पास के इलाकों में भी उसकी बराबरी का चोर कोई नही था।


दोस्तो उस चोर का एक बेटा भी था, जिसे वह अपनी तरह एक शातिर चोर बनाना चाहता था। वह शरीर चोर अपने बेटे को हमेशा एक ही बात सिखाता था की “बेटा कभी भी किसी साधु संन्यासी का उपदेश मत सुनना। अगर कोई तुमसे कुछ कहने भी लगे, तो अपने कान बंद करले ना और वहा से भाग जाना।”


उस चोर का बेटा उसकी इस बात को बचपन से ही सुनता आ रहा था, जिसके कारण उसके मन में यह बात बैठ गई थी। क्योंकि उस लड़के का पूरा ध्यान चोरी करने पर ही था, इसीलिए वह भी अपने पिता की तरह एक शातिर चोर बन जाता है।


हमारा ध्यान जिस भी चीज पर ज्यादा होता है, हम उस चीज में माहिर हो जाते हैं। एक दिन वह चोर सोचता है की छोटी मोटी चोरियां तो बहुत करली, क्यों न आज राजा के महल में ही डाका डालू। राजा के महल में चोरी करने के उद्देश्य से वह चोर मेहल की और चल पड़ता है।


मार्ग में उसे कुछ लोगों की भीड़ नजर आती है, वो उस भीड़ को देखकर रुकता है और यह देखता है की वे लोग क्या कर रहे हैं। जब वो चोर भीड़ के करीब जाता है, तो वो देखता है की सभी लोग एक एक करके एक संन्यासी के चरणों में गिरकर उनका आशीर्वाद ले रहे हैं।


वो संन्यासी और कोई नहीं बल्कि गौतम बुद्ध थे। वो चोर बुद्ध को देखकर उनकी तरफ आकर्षित हो जाता है, क्योंकि उसने भी पहली बार इतने तेजस्वी व्यक्ति को देखा हुआ था। अचानक उसे अपने पिता की बात याद आ जाती हैं की साधु संन्यासीयो से दूर रहना चाहिए।


एक बार को वह सोचता है की वह वहा से चला जाए, लेकिन फिर उसके मन में एक प्रश्न उठता है की पिताजी ऐसा क्यों कहते थे? इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए वो चोर सभी लोगो के साथ बैठ जाता है और गौतम बुद्ध का उपदेश सुनने लग जाता है।


बुद्ध उस उपदेश में झूठ बोलने की व्यर्थता और विश्वासघात के बारे में बताते हैं। उपदेश समाप्त होने के बाद वहा बैठे सभी लोग अपने अपने घर चले जाते हैं। और वो चोर भी चोरी करने के लिए मेहल की ओर चल पड़ता है। रास्ते में चलते हुए चोर अपने मन में सोचता है की क्यों न आज उपदेश में कही हुई बातो को मानकर ही देख लिया जाए।


उसके बाद वो चोर महल की दीवार पर से कूदकर जाने की बजाय महल के द्वार से ही अंदर प्रवेश करने लग जाता है। ऐसा करते देख मेहल का द्वारपाल उसे रोकता है, और उससे पूछता है की कौन हो भाई और कहा जा रहे हो?


वो चोर द्वारपाल से कहता है की में एक चोर हु और अंदर चोरी करने के लिए जा रहा हू। उस चोर की बात सुन द्वारपाल सोचता है की मेहल का कोई एक नौकर होंगा और मुझसे मजाक कर रहा है। वैसे भी कोई चोर अपने आप को कभी भी चोर नहीं बताता है। और वो द्वारपाल उस चोर को मेहल के अंदर जाने के लिए प्रवेश करने दे देता है।


महल मे प्रवेश करने बाद वो चोर उस तिजोरी तक पहुंच जाता है, जहा पर खजाना रखा हुआ था। वो चोर उस तिजोरी को तोड़कर बहुत सारा धन अपनी पोटली में भर लेता है और जैसे ही धन लेकर वो चोर वहा से जाने लगता है, तो उसे रसोई नजर आती है।


मेहल के सभी लोग सो रहे थे, इसीलिए रसोई में उस समय कोई भी नही था। और उस चोर को बहुत जोर से भूख लग हुई थी, इसीलिए वो चोर रसोइ में जाता है और पेट भरके खाना खाता है। भोजन करके वो चोर वहा से जानें लगता है, तभी अचानक उसे बुद्ध की दूसरी बात याद आ जाती है कि  “जिसका हमने नमक खाया है हमे कभी भी उसके साथ विश्वासघात नही करना चाहिए।”


वो चोर मन ही मन सोचता है की मैने इन राजमहल वालों का नमक खाया हुआ है, और अगर में इनके धन को चोरी करके ले जाऊंगा तो यह विश्वासघात होंगा। इसीलिए वह चोर उस धन को रसोई में ही छोड़कर जाने लग जाता है। ऐसा करते हुए उसे महल का एक व्यक्ति देखता है और वो शोर मचा देता है की महल में चोर घुस गया हुआ है।


राजा के सिपाही  उस चोर को पकड़ लेते हैं और उसे राजा के पास ले जाते हैं। और उसके बाद राजा उस चोर से पूछता है की “जब तुमने धन को चुरा ही लिया हुआ था, तो तुम उसे छोड़कर क्यों चले जा रहे थे।” वो चोर कहता है की “एक संन्यासी के उपदेश के कारण”


“किसी के साथ विश्वासघात करना बुद्धिमता नही है और बल्कि मूर्खता है।”


“जिसके भोजन को खाकर हमे जीवन मिला है, उसके साथ हमे कभी भी विश्वासघात नही करना चाहिए।”


उस व्यक्ति की बात सुन राजा प्रभावित हो जाता है और उस चोर से कहता है की “यदि तुम ऐसे उपदेश बचपन से ही सुनते आते, तो तुम कभी चोर बनते ही ना होते” जाओ में तुम्हे छोड़ता हूं। लेकिन एक बात को हमेशा याद रखना की 


“सही संगत और सही उपदेश ही व्यक्ति का जीवन बदल देते हैं”


शिक्षा 


 दोस्तो इस कहानी का उद्देश्य आपको सिर्फ यह सीखाना नही है की “आप किसी के साथ विश्वासघात ना करें, या झूठ ना बोले बल्कि ये कहानी आपको सीखाना चाहती है की 


“आप बुरे तब तक की है, जब तक की आप सही उपदेश सुनना और सही संगत करना शुरू नही कर देते”


“जो कल आपने गलत संगत कर ली थी, वही आज आपके दुखों का कारण है”

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