जीव लौटकर क्यों आता है? | दिल को छूने वाली कहानी | प्रेरणादायक कहानी | मोटिवेशनल कहानी
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान ने कहा है कि यह जीव साक्षात मेरा ही अंश है।"यह मेरा अंश यहां जीव लोक अर्थात संसार में आकर जीव बना है।"मेरा परमधाम ऐसा है जहां जाने के बाद वापस लौट कर आना नहीं पड़ता तो फिर जीव को भगवान की धाम में जाना चाहिए। जैसे कोई संतान अपने पिता के घर जाता है। इसी प्रकार जीव को भगवान के धाम में जाना चाहिए परंतु यह जीव पुनः संसार में लौटकर क्यों आता है?
जैसे हम सभी कहीं सत्संग के लिए जाएं और समय पूरा होने पर वहां से चल देंगे यदि जाते समय हमारी चद्दर भूल से वहां छूट गई या कोई भी चीज वहां रह गई तो हमें उसे लेने के लिए वापस जाना पड़ेगा। इसी तरह इस जीव ने संसार की जिन जिन चीजों में ममता कर ली चाहे वह घर परिवार जमीन रुपए कुछ भी हो, उनके छूटने पर ममता के कारण इसे लौट कर आना पड़ता है। संसार में जिन वस्तुओं को अपना माना है वहां लौट कर आना पड़ेगा। यह शरीर तू सदा रहेगा नहीं अतः दूसरा शरीर धारण करके आना पड़ेगा ।अब किसी भी योनि में जन्म ले, उसे फिर उन वस्तुओं के पास आना पड़ेगा।
एक बार श्री गुरु नानक जी महाराज कहीं जा रहे थे। उनके साथ उनके दो,चार शिष्य थे। किसी शहर की धान मंडी से होकर निकले ।धान मंडी में गेहूं जौ बाजरा मोठ चना आदि अनाज के बहुत से ढेर पड़े थे। इतने में एक बकरा आया और एक मोठ की ढे री में से मोठ खानेलगा। वहां पर उस ढेरी का मालिक बैठा हुआ था। उसने बकरे की केस पकड़ ली और उसके मुख पर डंडे मारने लगा। काफी मारपीट के बाद उसने उसके मुख से दाने निकलवा लिए।
इस दृश्य को देखकर श्री गुरु नानक जी महाराज हंसे। साथ में चल रहे शिष्यों को आश्चर्य हुआ उन्होंने पूछा महाराज बकरे को तो मार पड़ रही है और आप हंस रहे हैं। संतों की हर क्रिया किसी प्रयोजन को लेकर होती है अतः महाराज हमें बताएं आप हंसे क्यों?
तब श्री नानक जी महाराज बोले देखो जो मार रहा है वह बनिया इस बकरे का बेटा है और यह बकरा इस बनिए का बाप है। इससे पहले के जन्म में यह इस दुकान का मालिक था इस दुकान में इसका बैठने का स्वभाव था भीतर दुकान और बाहर जो यह बरामदा है इसी में यह बैठा रहता था इसलिए आज कल भी रात में या बकरा यहां ही बैठता है। इसको याद नहीं है लेकिन इसको यह जगह ही अच्छी लगती है ।इसने बड़े-बड़े देवताओं की मनौती करके इस पुत्र को पाया था ।कमाया हुआ बहुत साधन इसी बकरे का है लेकिन आज थोड़े से दानों में इसका हिस्सा नहीं है। खाने के लिए आता है तो मार पड़ती है और मुंह से दाने निकाल लिए जाते, लोग फिर भी संग्रह करते हैं।
यह जीव जिस किसी भी बस्तु या जगह में आसक्ति प्रियता या वासना रखेगा, उसे मृत्यु के बाद चाहे कोई भी योनि मिले उसी जगह आना पड़ेगा। पशु पक्षी चिड़िया चूहे आदि उसी घर में जाते हैं जिसमें पूर्व जन्म में राग था। ऊंच-नीच योनियों में जन्म होने का कारण है _गुणों का संग, आसक्ति, प्रियता ,वासना। जो जड़ चीजों में प्रियता रखेगा उसको लौट कर आना पड़ेगा। जिसकी जड़ वस्तुओं में आसक्ति या प्रियता नहीं और भगवान के साथ प्रेम है वह भगवान को प्राप्त हो जाता है। इतनी विलक्षणता है अंत काल में भी भगवान का स्मरण करने वाला निसंदेह भगवान को प्राप्त हो जाता है ।अंत काल में भी याद कर ले तो बेड़ा पार है।
अंतकाल के स्मरण से भी यह जी वभगवान को प्राप्त हो जाता है क्योंकि इसका भगवान से घनिष्ठ संबंध है। फिर यह लौटकर क्यों आता है? इसमें हास कारण यह है कि संसार की चीजों में अपना पन कर लेने से इसको विवश होकर यहां आना पड़ता है। इस जीव का मन संसार में किस जाता है तो भगवान फिर वैसा ही मौका दे देते हैं अर्थात जन्म दे देते हैं। इसलिए जीव को उचित है कि यहां रहता हुआ भी निर्लेप रहे ।भीतर में ममता आसक्तिकरके फंसे नहीं।
ऐसा माने की ठाकुर जी का संसार है ठाकुर जी का परिवार है ठाकुर जी के रुपए हैं ठाकुर जी का घर है। हम तो ठाकुर जी का काम करते हैं ।मुनीम की तरह रहे ।मालिक न बने। जो काम करें उसका एहसान ठाकुर जी पर रखे कि महाराज हम आपका काम करते हैं हमारा यहां क्या है? परिवार आपका, घर आपका ,धन आपका, जमीन आपकी ।यही सच्ची बात है, क्योंकि जब जन्मे थे नंग धड़ंग आए थे ।एक धागा भी पास में नहीं था और मरेंगे तो यह लाश भी यही पड़ी रहेगी। लाश को भी साथ नहीं ले जा सकते ,तो धन संपत्ति वैभव परिवार साथ में ले जा सकेंगे क्या?
साथ में लाएं नहीं, साथ में ले जा सकते नहीं और यहां रहते हुए भी इन सब को अपने मन मुताबिक बना सकते नहीं। हमारा प्रत्यक्ष अनुभव है कि हमारे लड़की लड़की हमारा कहना नहीं मानते स्त्री या नहीं मानती कुटुंबी जन नहीं मानते तो सिद्ध हुआ कि हम इनको अपने मन मुताबिक नहीं बना सकते और जितने दिन चाहे साथ में रख नहीं सकते ,बदल नहीं सकते। स्वभाव बदल दे या रंग बदल दे _यह हमारे हाथ की बात नहीं फिर भी इनको कहते हैं "मेरी चीजें "।यह मेरे कैसे हुऐ बताइए?
अतः मानना ही होगा की यह सब मेरे नहीं है, भगवान के दिए हुए हैं और भगवान के हैं।
भगवान ने हमें धन, संपत्ति ,वैभव ,कुटुंब आदि सेवा करने के लिए दिए हैं। अच्छी तरह प्रबंध करो। सबको सुख पहुंचाओ ।पर आप मालिक बन कर बैठ गए। क्या यह माल कियत सदा रहेगी? नहीं फिर भी हम इन्हें "हमारे "कहते हैं।
वस्तुओं के साथ केवल अपने पन की मान्यता है। अपनापन वास्तव में है नहीं केवल माना हुआ है। प्रभु के साथ अपनापन वास्तव में है निश्चित है केवल उनको भूले हुए हैं। प्रभु अपने होते हुए भी हम उनको भूल गए उन से विमुख हो गए और संसार कभी अपना हुआ नहीं हो सकता नहीं उसको हमने अपना मान लिया इसलिए यहां लौट कर आना पड़ता है।
मैं भगवान का हूं केवल भगवान ही मेरे हैं सब चीजें भगवान की है मेरा कुछ नहीं है यह बातें जो ठीक ठीक समझ लेता है उसको मरने के बाद यहां लौट कर नहीं आना पड़ता लेकिन जो संसार में ममता रखता है और मर जाता है तो उसे लौटना ही पड़ता है।

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